छग: बड़ा सवाल…22 जवानों की शहादत का जिम्मेदार कौन…?
कैसे हुई सिस्टम की मौत
देश का दुख देखकर आत्मा बिलख पड़ी। इसलिए हिम्मत गवाह नही देने के बावजूद मैंने भी बंदूक (कलम) उठा ली। समझ सकते हैं कि हम किस स्थिति में होंगे। लेकिन जब देश की बात आती है। हिम्मत,हौसला,जज्बा अपने आप आ जाता है। मुझे बीजापुर की घटना ने बहुत दुखी किया है। जिसके परिजनों पर यह गुजरी है वह किस स्थिति में होंगे। इस घटना ने पुलवामा की घटना भी ताजा करदी। हमारा सिस्टम कितनी भी डींगें मरता रहे। अलंकृत होता रहे, लेकिन उसकी नपुंसकता उजागर हो ही जाती है।
बीजापुर, छत्तीसगढ़ का नक्सली गढ़ है। इसके पूर्व भी नकसली हमले, बारूदी सुरंग के जरिये हुए जिसमें कई लोग मारे गए हैं। मतलब,जब आप नक्सली ऑपरेशन चला रहे हैं,तो इसमें जमीनी खुफिया रिपोर्ट (क्लीन चिट) के बाद ही यह ऑपरेशन चलाया गया होगा। जाहिर है, 22 जवान शहीद और 31 जवान घायल हैं। इसकी जिम्मेदारी सबसे पहले गुप्तचर तंत्र को क्यों नही लेनी चाहिए ..? नीचे से लेकर ऊपर तक के अफसरों की भूमिका संदिग्ध दिखाई दे रही है। इस प्रकार के देश में जो भी मामले हुए हैं,उसमें नक्सलियों से सांठगांठ किसी भी स्तर पर हो सकती है। छग की कई विधानसभा,लोकसभा सीटों का भविष्य भी यही तय करते हैं। जाहिर,है आस्तीन में सांप लिपटे होंगे। कई राजनेताओं का नेटवर्क भी साइलेंट किलर के रूप में काम करता है। सरकार,दुश्मनों से लोहा लेने में हर मोर्चे पर नाकाम दिखाई देती है। ऐसे में बीजापुर हो पुलबामा हो होते रहेंगे। नेताओं को फूल मालाएं चढ़ाने के अवसर मिलते रहेंगे। और दुश्मनों से पंगा लेने का यही सिला मिलता रहेगा।
मनीष वर्मा की कलम से।
