जिस राग में रंग कर सिंधिया और
भाजपा पास आयी थी,शायद “जिस
पथ पर चला—– जरा पास तो आने दे,
साथी न समझ”…. की तर्ज थी?
जब कमलगट्टे की सरकार गिरी थी,तब भी ज्येतिरादित्य सिंधिया ने अपने ट्वीटर हैंडल से “कॉग्रेस” हटाया था और उसके कुछ दिनों बाद 22 विधायकों के साथ कॉग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गये थे। अब सिंधिया जी ने अपने ट्वीटर हैंडल से आज BJP हटा दिया है? यानी मौत भले ही न आई हो पर मौत ने दरवाजा देख लिया है?
जब सिंधिया भाजपा में आये थे तब आपसी चर्चा में यह तय हुआ था कि सिधिया समर्थक सारे विधायकों को मंत्री बनाया जायेगा और सभी समर्थक विधायकों को चुनावी टिकट दिया जायेगा। इस शर्त पर कमरनाथ की सरकार तो भरभरा कर गिर गई पर भाजपा जो पन्द्रह महीने सत्ता से बाहर रहकर घबरा गई थी आनन -फानन में सारी शर्तें मानकर सत्ता में काबिज हो गई,पर भाजपा अपनी आदत के मुताबिक सिधिया और उसके समर्थकों को अपनी कसौटी पर कसने लगी। लगभग डेढ़ महीने बाद दो सिंधिया समर्थकों को मंत्री बनाया पर तरसा तरसा कर…सिधिया भी राज्यसभा चुनाव स्थगित होने के कारण केंद्र मेेें वायदे के मुताबिक मंत्री नहीं बन पाये,यदि भाजपा चाहती तो केंद्र में मंत्री बना सकती थी राज्यसभा में मनोनयन बाद में हो जाता?
इधर जिन सीटों पर विधान सभा के उपचुनाव होना है,वो 22 सीटें सिधिया समर्थक विधायकों के इस्तीफे से रिक्त हुई हैं किन्तु भाजपा के जो प्रत्याशी इनसे हारे थे वे भी टिकट न मिलने पर बगावती तेवर अपना चुके हैं,इधर ग्वालियर चम्बल में भाजपा के कद्दावर नेता और केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने 17 सालों में अपना साम्राज्य खड़ा कर लिया है,उनके अपने समर्थकों और चाहने वालों की अपनी फौज है। इधर सिंधिया भी ग्वालियर चंबल संभाग में अपना प्रभाव रखते हैं व उनके समर्थकों की भी फौज है। दोनों के समर्थक भी एक दूसरे को पचा नहीं पा रहे।इधर काफी जद्दोजहद के बाद भी सिधिया अपने साथ आये सभी विधायकों को टिकट नहीं दिला पा रहे, भाजपा ने यह भी कह दिया है कि उपचुनाव में ग्वालियर चंबल संभाग में पार्टी का चेहरा शिवराज सिंह रहेंगे और सिधिया का चेहरा उनके समर्थक के रूप में रहेगा। सिंधिया इसे भी नहीं पचा पा रहे?
आखिर सिंधिया अब क्या करेंगे? क्या अपने पिता द्वारा बनाई गई पार्टी को जीवित करेंगे या फिर कॉग्रेस में जायेंगे? शुरुआत तो उन्होंने कर दी है,अपने ट्वीटर हैंडल से अपने नाम के साथ जुड़ा बीजेपी शब्द हटा दिया है।
क्या ऐसी स्थिति में भाजपा सरकार यदि उपचुनाव को काबू नहीं कर सकी तो क्या भरभरा कर गिर जायेगी?
साभारः
