मप्र: सरकार के फैसलों पर किसान उठा रहे सवाल
मुख्यमंत्री जी यह कैसी ऑनलाइन सेवा है आपकी
ग्राउंड रिपोर्ट
एक तरफ देश में विशाल किसान आंदोलन चल रहा है,जिसने केंद्र सरकार की नींद हराम कर दी है। वहीं मप्र के किसान राज्य सरकार के किसान हितैषी कदमों से परेशान है। राज्य सरकार ने किसानों की चिंता करते हुए नामान्तरण के सरलीकरण की बात कही है। मतलब अब किसानों को पटवारी से लेकर आधा दर्जन बाबुओं और तहसीलदार के चक्कर नही काटना पड़ेंगे। इसके लिए नामान्तरण प्रक्रिया को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन इस प्रक्रिया के बाद किसानों पर दोहरी मार पड़ी है। अब उसे ऑनलाइन आवेदन के लिए जेब खाली करना पड़ रही है। उसके बाद वही दस्तावेज उसे तहसीलदार के पास आवेदन के लिए फिर से लगाना पड़ रहे हैं। मतलब,किसानों की समस्या दुगनी हो गई है। ऑनलाइन आवेदन में खर्च देखा जाए तो करीब दो सौ रुपये तक जाता है। इसके बाद संबत 2015,13 की खतौनी का खर्च बाबुओं की टेबल तक जाता है।
तहसीलदार,बाबू,पटवारी का चढ़ोत्तरा अलग से। तभी आपका माह में नामान्तरण हो पाएग।
वह भी तब जब कोई पेंच न लगे
सरकारी दावा :
जबकि सरकारी दावा है कि रजिस्ट्री होने के उपरांत नामान्तरण स्वतः हो जाएगा। जबकि धरातल पर यह नही हो रहा है। पटवारी के द्वारा नामान्तरण की फीस यानि ठेका 3 से 5 हजार होता है। तब किसान को घर बैठे नामान्तरण मिल सकता है।
डायवर्जन में पेंच
यही हाल भूमि के डायवर्जन का है। सरकारी नियम कहते हैं कि ऑनलाइन आवेदन के बाद डायवर्जन हो जाएगा। जबकि ऐसा नही है। इसके लिए भी एसडीएम को सभी दस्तावेजों के साथ आवेदन और अंडर टेबल प्रक्रिया के बाद ही डायवर्जन होता है। यह हाल प्रदेश की सभी तहसीलों का है।
पटवारियों से परेशान किसान
राज्य सरकार ने किसानों की समस्याओं को देखते हुए सीमांकन,तरवीन, बटांक का भी सरलीकरण किया है। यदि हम छतरपुर जिले के हालात देखें तो पटवारी समय सीमा में कोई भी कार्य नही करते। पटवारियों की दुकान पर अधिक से अधिक चढोतरे के बाद ही किसानों की समस्याओं का निदान हो रहा है। सबसे ज्यादा खराब स्थिति अनपढ़ गरीब किसान की है। वह सीमांकन,बटवारे,तरबीन, नामान्तरण के लिए महीनों से चक्कर काट रहे हैं।
मुख्यमंत्री के प्रयासों पर अमल नही
प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने किसानों के लिए पटवारियों और तहसील के चंगुल से मुक्त करने के प्रयास तो किये हैं। लेकिन समयावधि में कार्य नही करने पर दंडात्मक प्रावधन की जरूरत किसान महसूस कर रहे हैं। ताकि सभी कार्य समय पर आसानी से हो सकें। किसान बरजोर सिंह कहते हैं -यदि राज्य सरकार समयावधि पर कार्य नही होने पर तहसीलदार,एसडीएम की सीआर को जोड़ दें तो किसानों के कार्य समय पर सम्पन्न हो सकेंगे।
रेवन्यू मैनेजमेंट सिस्टम
राज्य सरकार ने किसानों की सुविधा के लिए रेवन्यू मैनेजमेंट सिस्टम बनाया है।लेकिन इसका किसानों के लिए कोई फायदा नही हो रहा है। दमोह जिले के किसान नरपत कुर्मी कहते है- राज्य सरकार को चाहिए कि किसानों के सीमांकन,तरवीन,नामान्तरण के लिए पटवारी की जिम्मेदारी तय करे। पटवारी किसानों को घर जाकर चाहे गए दस्तावेज दे। तभी राज्य सरकार की मंशा पूरी होगी।
1958 का रिकॉर्ड क्यों
नामन्तरन में अभी भी पटवारी 1958 की रिपोर्ट यानि खतौनी लगाने की बाध्यता कर रहे हैं। जिससे किसान रिकॉर्ड रूम के बाबू,डिस्पेच,अभिलेख अधिकारी,तहसीलदार के साइन के लिए टेबलों पर चढोतरे के साथ घूमता रहता है। यह ऐसी विसंगतियां हैं जिनका फायदा पटवारी से लेकर तहसील के कर्मचारी उठाते हैं।
एसडीएम,तहसीलदार की कमाई
प्रदेश की छतरपुर,टीकमगढ़,सागर,दमोह सहित कई तहसीलों की पड़ताल के बाद यह बात साफ हो गई कि तहसीलदार,एसडीएम भी किसानों से प्रति माह लाखों रुपये कमाते हैं। बिचौलिए के रूप में शाखाओं के बाबू और दलाल अहम किरदार निभाते हैं।
