भोपाल।महिला अध्यापकों के मुंडन कराने से कर्मचारी राजनीति गरमा गई है। कर्मचारियों का कहना है कि पहले काली पट्टी बांधकर विरोध करने से काम चल जाता था। बातें सुनी जाती थी मांगों का निराकरण भी होता था। अब महीनों आंदोलन करने के बाद भी सरकार बात नहीं सुन रही है। यह असंवेदनशीलता का नतीजा है जो किसी भी सरकार के लिए ठीक नहीं है। इसी असंवेदनशीलता के चलते आज कर्मचारियों को आंदोलन के लिए भीख मांगने, मुंडन कराने जैसे अपरंपरागत तरीके अपनाने पड़ रहे हैं।
जंबूरी मैदानी में शनिवार को मुंडन महिला अध्यापक शिल्पी शिवान, रेणु सागर, सीमा छीरसागर और अर्चना शर्मा ने मुंडन कराया है। इस पर राज्य मंत्रालयीन कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सुधीर नायक का कहना है कि सरकारी तंत्र में संवेदना खत्म होती जा रही है, महिलाओं का मुंडन कराना इसका नतीजा है। कर्मचारी कांग्रेस अध्यक्ष वीरेंद्र खोंगल ने कहा कि महिलाओं का मुंडन कराना अपशगुन माना जाता है, महिला सशक्तिकरण की बात करने वाली सरकार को इन महिलाओं को रोकना चाहिए था। सेवानिवृत्त कर्मचारी व पेंशनर गणेशदत्त जोशी ने कहा कि सरकार को इस तरफ सोचना चाहिए कि जो महिलाओं को इस तरह के कदम उठाने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा। लक्ष्मीनारायण शर्मा, उमाशंकर तिवारी ने कहा कि जब कोई धीमा बोलने पर नहीं सुनेगा तो जोर से चिल्लाना पड़ेगा। अनिल बाजपेयी, विजय रघुवंशी ने कहा कि प्रदेश में कर्मचारियों की समस्या जायज है, इन समस्याओं पर सरकार ने ध्यान देने की बजाए संवाद खत्म कर लिया है जो गलत है। कर्मचारियों का कहना है कि इन्हीं कारणों से चलते कर्मचारी आंदोलन करने नए-नए तरीकों को अपना रहे हैं।
आंदोलन में ये भी हुआ
– अध्यापक के एक गुट के नेता ने माइक संभाला तो आंदोलन करने वाले अध्यापक आक्रोशित हो गए और विवाद करने लगे। अध्यापकों का आरोप था कि तथाकथित गुट के लोग अध्यापक के नाम पर सरकार के लिए काम करते हैं।
– मुंडन कराने वाले अध्यापकों की संख्या बढ़ गई तो मुंडन करने वाले (नाई) की व्यवस्था करनी पड़ी।
– अध्यापकों की तबीयत बिगड़ रही थी लेकिन मौके पर एम्बुलेंस की व्यवस्था नहीं थी, पुलिस वाहन से अध्यापकों को अस्पताल पहुंचाना पड़ा।
