त्रिपुरा में 25 साल पुराना ‘लाल’ किला ढह गया। त्रिपुरा के साथ-साथ पूर्वोत्तर के दो अन्य राज्य नगालैंड और मेघालय में भी विधानसभा चुनाव संपन्न हुए, जिसके नतीजे केंद्र में सत्तारूढ बीजेपी के लिए जहां उत्साह बढ़ाने वाला है, वहीं कांग्रेस के लिए मनोबल गिराने वाला है, जो आगामी 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को टक्कर देने की सोच रही है। अगले आम चुनाव से ठीक पहले 2018 का यह बड़ा जनादेश बीजेपी की व्यावहारिक और वैचारिक राजनीति को भी मजबूती प्रदान करता है।

यूं तो 2018 का यह बड़ा जनादेश पूर्वोत्तर के तीन राज्यों से आया है, पर राजनीति में रुचि रखने वाले देशभर लोगों और पर्यवेक्षकों की नजर त्रिपुरा पर खास रही, जहां 25 साल पुरानी वामपंथी सरकार धराशायी हो गई। लेफ्ट को इस चुनाव में महज 16 सीटें मिलीं, जबकि बीजेपी जो 2013 के विधानसभा चुनाव में कहीं नहीं थी, ने 60 सदस्यीय विधानसभा, जिनमें से 59 सीटों पर ही वोट डाले गए, में लगभग दो तिहाई सीटें जीतते हुए गठबंधन साझीदार Indigenous People’s Front of Tripura (IPFT) साथ मिलकर 43 विधानसभा क्षेत्रों में जीत दर्ज की।
पिछले चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर 50 सीटें जीतने वाली लेफ्ट पार्टियों को इस चुनाव में महज 16 सीटों पर सिमट जाना पार्टी के लिए कोई सकारात्मक संकेत नहीं हो सकता। हालांकि सीपीएम को 42.6 प्रतिशत वोट मिले हैं, जो बीजेपी को इस चुनाव में मिले 43 प्रतिशत वोटों से कुछ ही कम है, पर इससे सीटों के बड़े अंतर को पाटा नहीं जा सका। पहले पश्चिम बंगाल और अब त्रिपुरा से वामपंथ के प्रति लोगों की बेरुखी ने देश की राजनीति में इसी प्रासंगिकता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
‘वामपंथ युवाओं की आकांक्षाओं को समझने में नाकाम रहा’
आखिर क्यों आम लोगों के हकों की बात करने वाली वाम राजनीति हाशिये पर जा रही है और लोगों का उससे मोहभंग हो रहा है? इस सवाल के जवाब में देश के प्रतिष्ठित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहे राजनीतिक विश्लेषक आनंद कुमार कहते हैं, त्रिपुरा में वामपंथ लोगों, खासकर युवाओं की आकांक्षाओं को समझने में नाकाम रहा। यहां पिछले 25 साल से सत्ता में काबिज सीपीएम ने कानून एवं व्यवस्था की स्थिति तो काफी हद तक दुरुस्त कर ली और सीमाई इलाकों से होने वाली घुसपैठ को रोकने में भी कामयाब रही, पर वह इससे आगे नहीं बढ़ पाई। यहां चिकित्सा सुविधा से लेकर शिक्षा और कारोबार के लिए भी कुछ ऐसा नहीं है, जिससे लोगों की समस्याएं दूर हो सकें। चिकित्सा हो या शिक्षा, कुछ भी बेहतर पाने के लिए उन्हें कोलकाता ही भागना पड़ता है। बीजेपी ने इसे पहचाना और चुनाव में मुद्दा बनाया।
‘सीपीएम को सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा’
तो क्या सिर्फ विकास के मुद्दे पर जीत गई बीजेपी? प्रोफेसर आनंद कुमार के अनुसार, कोई एक मुद्दा जीत या हार का कारण नहीं बनता। यहां पिछले 25 साल से सत्ता में काबिज सीपीएम को कुछ हद तक सत्ता विरोधी लहर का सामना भी करना पड़ा, लोग बदलाव तो चाहते ही हैं और बीजेपी के रूप में उन्हें एक विकल्प दिखा, जिसके लिए उन्होंने वोट किया। फिर बीजेपी ने वहां क्षेत्रीयतावादी राजनीति को भी पहचाना और लेफ्ट विरोधी ताकतों को एकजुट करने में कामयाब रही। इसी के तहत उसने IPFT से हाथ भी मिलाया, जो स्थानीय राजनीति कर रही थी। त्रिपुरा ही नहीं, मेघालय और नगालैंड में भी बीजेपी ने स्थानीयता व क्षेत्रीयता की पहचान को लेकर संघर्षरत समूहों के साथ हाथ मिलाया और उन्हें पहचान दी। कहा जा सकता है कि बीजेपी ने यहां जो लाइन अपनाई, वह पूरे देश में उसके हिन्दुत्व की लाइन से बिल्कुल अलग है।

अब देश में बीजेपी या उसके गठबंधन दलों द्वारा शासित राज्यों की संख्या 21 हो गई है, जहां देश की करीब 70 फीसदी आबादी बसती है। देश की राजनीति में यह स्थिति 1990 के दशक की शुरुआत में थी, जब विभिन्न राज्यों में कांग्रेस का बोलबाला था। 1993 के आखिर तक देश में के 15 राज्यों में कांग्रेस की सरकार थी, जबकि एक अन्य राज्य में उसकी गठबंधन सरकार थी। पर आज स्थिति बिल्कुल अलग है। यह स्थिति कांग्रेस के लिए भी आंखें खोलने वाली है, क्योंकि त्रिपुरा के चुनाव में उसने जहां अपनी सभी 10 सीटें गंवाईं, वहीं उसका वोट प्रतिशत भी 2013 के विधानसभा चुनाव के 36.53 प्रतिशत के वोटों से खिसकर दो प्रतिशत से भी कम रह गया। आखिर क्या वजह रही कि दिसंबर में संपन्न हुए गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कड़ी टक्कर देने वाली और फिर उपचुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने वाली कांग्रेस यहां फिसड्डी साबित हुई? हाल ही में रिसर्च फेलो के तौर पर त्रिपुरा का दौरा करने वाले प्रोफेसर आनंद कुमार कहते हैं, कांग्रेस का रवैया यहां शुरू से ही उदासीन बना रहा। कांग्रेस राज्य में पिछले काफी वर्षों से ‘साइलेंट’ विपक्ष की भूमिका में थी और कहा जा सकता है कि इस चुनाव में उसका सफाया, उसे इसके लिए मिली एक सजा की तरह है।
हालांकि उक्त तीनों राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या केवल 5 है, फिर भी यहां बीजेपी के शानदार प्रदर्शन को कमतर करके नहीं आंका जा सकता। यह किसी भी पार्टी के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां त्रिपुरा में बीजेपी की जीत को ‘शून्य से शिखर’ की कामयाबी करार दिया है, वहीं पार्टी हर बार की तरह इस बार भी जीत का श्रेय मोदी के सिर बांध रही है। तो क्या यहां भी चला है मोदी का जादू? प्रोफेसर आंनद कुमार कहते हैं, त्रिपुरा में ‘मोदी मैजिक’ से ज्यादा ‘असम इफेक्ट’ कारगर साबित हुआ। असम में पहले से ही बीजेपी की सरकार है और इसलिए पार्टी को पूर्वोत्तर के राज्यों में अपनी राजनीतिक उपस्थिति एवं संपर्क बनाने में आसानी हुई।
‘लेफ्ट के लिए यह चुनाव आईना दिखाने वाला है’
पहले ही पश्चिम बंगाल से और अब त्रिपुरा से सफाये के बाद केवल केरल तक सिमट चुके लेफ्ट के लिए यह चुनाव परिणाम क्या संदेश देता है? इस बारे में पूछे जाने पर प्रोफेसर आनंद कुमार ने कहा, लेफ्ट के लिए यह चुनाव आईना दिखाने वाला है, उसे अपनी राजनीति का आकलन करने की जरूरत है। उसमें कई विरोधाभासी बातें हैं, जिसे समझने और दूर करने की जरूरत है। एक तरफ पश्चिम बंगाल में वह कांग्रेस के साथ है तो केरल में वह इसके खिलाफ है। यह राजनीति नहीं चल सकती। त्रिपुरा में यह तरीका काम नहीं आया।
