सीहोर से सतीश सेन की रिपोर्ट
पर्यावरण प्रेमी संघ द्वारा पर्यावरण प्रेरक एडवोकेट धीरज धारवां ने अपने नागरिक कर्तव्यों के प्रति लोगों को प्रेरित करते हुए कहा कि विश्व वसुंधरा दिवस पृथ्वी दिवस के अवसर पर आज हर व्यक्ति अपनी प्यास बुझाने के लिए नल हैंडपंप ट्यूबवेल एवं गोडं से पानी प्राप्त कर अपनी प्यास बुझाता है ।लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि इस धरती पर मनुष्य जाति के अलावा भी और प्राणी है ,वह हैं पशु पक्षी धीरे धीरे हवाओं के गर्म गर्म कपड़े थपेड़े चलना शुरू हो गए हैं ,और वर्तमान समय में वैश्विक महामारी कोरोना के कारण लगभग पूरा देश लाक डाउन की स्थिति में है पृथ्वी इस समय शुद्ध वायु शुद्ध जल तथा वाहनों के एवं फैक्ट्रियों के दूषित धुऐं के बगैर वायुमंडल शुद्ध हो गया है। इसी कारण पृथ्वी के ओजोमंडल के तेज में वृद्धि हुई है,लगता है कि ओजोन परत में जो छिदृ हो गया था वह भी शीघ्र ही भर जाएगा । लेकिन इस समय पक्षियों की तरफ लोगों का ध्यान कम ही जा रहा है और बिगड़ते पर्यावरण के चलते सबसे ज्यादा परेशान होते हैं पशु एवं पक्षी। वैसे देखा जाए तो इस के लिए प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से बदहाली के जिम्मेदार हम ही हैं। प्रत्येक नागरिक अगर ध्यान से देखें तो अपनी पेट पूजा के लिए यह बेजुबान कभी कचरे कूड़े के ढेरों पर ,तो कभी गंदगी युक्त जगहों पर अपना भोजन ढूंढते नजर आएंगे । इसी प्रकार पानी के लिए यह पशु पक्षी नालियों में बहते पानी से या इधर-उधर गंदे पानी से प्यास बुझाते हैं आज हम सभी लोग चाहे वह किसी भी धर्म या मजहब के हो लेकिन सबसे पहले हम एक इंसान हैं और इसलिए इंसानियत के नाते इस पृथ्वी दिवस पर अपने कर्तव्यों को पहचान कर इन मुक प्राणियों के लिए ज्वार , चावल ,चना ,दाल रोटी आदि जो भी बने वह भोज्य हेतु उन्हें रखें,तथा अपने घर एवं मोहल्ले के सुरक्षित स्थानों पर पानी की ठेल, पेड़ों पर छत पर मिट्टी के सकोरे आदि टांग कर उनमें पानी अवश्य भरें । पर्यावरण प्रेरक श्री धारवां ने बताया की अपने बुजुर्गों से पूछिए कि किसी समय में नए दिन की शुरुआत पक्षियों का कलरव से होती थी, लेकिन अब इनकी कम होती संख्या ने आंगन की रौनक समाप्त कर दी है,वर्तमान समय में यदि खुद से पहले हम इन परिंदों की फिक्र करना शुरू करेंगे तो निश्चित मानिए अलसुबह जब चहचहाते पक्षियों की आवाज मन को सुकून देगी और अपनी मीठी आवाज से आपको जगा देगी । पुराने समय में मंदिरों तथा मस्जिदों में परिंदों के लिए दाना पानी के भंडारे की व्यवस्था हुआ करती थी । और उसमें खास बात यह होती थी कि रोज सही वक्त पर दाना पानी की आस लिए तोते कबूतर चिड़िया इकट्ठे हो जाते थे । यदि इन बेजुबानों को मिलेगा दाना पानी तो ही हम सभी को मिलता रहेगा दाना पानी। इस उम्मीद के साथ आज से शुरुआत करें । जनप्रतिनिधियों से निवेदन है कि वह भी इस अभियान का अपने मोहल्लों नगरों ग्रामों में प्रचार अवश्य करें तथा सोचें कि इनकी चिंता करना भी हमारा दायित्व है l
