समूह सम्पादक सैयद खालिद कैस @8770806210
भोपाल -प्रदेश मे विधानसभा चुनाव 2018 की अधिसूचना जारी होते ही सभी थाना क्षेत्रो के आदतन अपराधियो के ख़िलाफ़ धरपकड़ अभियान चला ।राजधानी भोपाल की स्थिति पर नज़र डाले तो पुलिस ने गुंडे बदमाशों की लाइन मे सभ्य परिवारों को तक घसीट डाला । लिहाज़ा पुलिस ने धारा 110जाफौ के नए पुराने अपराधियो सहित पारिवारिक या मामूली वाद विवाद पर आधारित धारा 107/116जाफौ के मामूली मामलों मे भी जबरदस्ती अंतिम बंध पत्र भरवा लिऐ , जिन लोगों द्वारा बंध पत्र भरने से इंकार किया तो उनको डरा धमका कर विवश किया कि वह अंतिम बंधपत्र भरे । इस मुहिम मे पुलिस वालों , बिचौलियो सहित कोर्ट मुंशीयो ने जमकर चांदी काटी । अर्थात सारे कायदे क़ानून को ताक मे रखकर मानव अधिकारों की हत्या ही कर दी ।
अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग
एसडीएम न्यायलयों मे एक ही तरह के धारा 110,151,107/116 जाफौ के मामलें आते हैं परंतु सब की अपने आपने हिसाब से मुचलके बंधपत्र की राशि निर्धारित है । सबसे अधिक राशि के मुचलका बँध पत्र एसडीएम गोविन्दपुरा मे भरवाए जाते है जो एक लाख रुपए से 05 लाख रुपए तक की राशि के होते है जबकि अन्य एसडीएम 15-20-25हज़ार रूपए के मुचलके बंधपत्र भरवाते हैं । इस और भी कलेक्टर का ध्यानाकर्षण होना चाहिए । इसी न्यायालय से लकी सरदार नामक व्यक्ति को एक साल के लिऐ इस लिऐ जैल भेजा गया था क्यूंकि उसने बंधपत्र उल्लंघन करने पर एक लाख रुपए जमा नही किये थे ।
कलेक्टर , कमिशनर भी मानव अधिकार की हत्या करने मे पीछे नही
आज कलेक्टर भोपाल ने ताबड़तोड़ 28 लोगों को एक दम 01 साल के लिऐ जिला बदर कर दिया । चुनाव के मद्देनजर शांति व्यवस्था कायम रखने के लिऐ अपराधियो पर अंकुश अनिवार्य है , परंतु इसका यह अर्थ नही की निर्दोषों को भी बलिवेदी पर चढ़ा दिया जाए । कलेक्टर ने जिन 28 लोगों को मप्र राज्य सुरक्षा अधिनियम 1990 के तहत जिला बदर किया उनमे से अधिकतर वह लोग थे जिनके विरूध्द वर्षो से या तो कोई केस नही था या मामूली लड़ाई झगड़े के प्रकरण थे जो खत्म हो चुके हैं । परन्तु सारे नियमो को ताक मे रखकर कर दिया गया जिला बदर । यह सिलसिला अभी और भी जारी रहेगा ।
दुर्भाग्य की बात यह है कि कलेक्टर इससे पहले एडीएम द्वारा किये गए लोग जब कमिशनर कोर्ट मे न्याय पाने के लिऐ अपील पेश करते हैं तो एक लंबे अंतराल बाद कमिशनर भी अपील निरस्त कर देते है जबकि यही मामले जब हाई कोर्ट जाते हैं तो कलेक्टर , कमिशनर के आदेशों को खारिज होते देर नही लगती , मगर हर कोई हाई कोर्ट नही पहुंच पाता है ।
